2nd October 2023, Mumbai: भारतीय राजनीतिक दलों द्वारा आज जितनी भी आरक्षण की आवाज उठ रही है, उसमें लाभार्थियों को सम्मान से ज्यादा अपमान ही हो रहा है। क्योंकि उसमें योग्यता को दर किनार किया जाता है। साथ ही आरक्षण से आरक्षण वॉटकर आपसी द्वेष फैला रहे हैं। यह सब लाभार्थी हित के बजाय अपने वोट बैंक हित को प्रमुख बनाया है।
बिहार राज्य में जनप्रतिनिधि के रूप में महिला आरक्षण तो मिल गया। परंतु एक लकीर को छोटा करके दूसरे को बड़ा बताकर। यानी महिला आरक्षण में भी दलित ओ.बी.सी. अल्पसंख्यक में बांटकर, लकीर को छोटा बड़ा करके आरक्षण मिला। परिणामतः आरक्षण का लाभ तो मिला। परंतु लाभार्थी महिला नहीं अपना पद सामन पाया। ना तो वोटर अपने प्रतिनिधि को पहचान पाया। लाभ उनके क्षमतावान अभिवावक को मिल रहा है। ऐसे आरक्षण से सम्मान के बदले अपमान ही महिला लाभार्थी ढो रही है।
केंद्र सरकार ने जब महिला आरक्षण कानून बनवा दिया है। तो विपक्ष ने अब महिला में महिला आरक्षण मांग का आरक्षण को अपमानित कर रहा है। यदि सच में विपक्ष को दलित ओ.बी.सी. आरक्षण से हमदर्दी है तो अब बारी है विपक्ष की, अगले चुनाव में अपने दलों में ऐसी उम्मीदवार उतार कर एक विशाल कायम करें। ऐसा करने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता है। सही अर्थों में राजनीतिक दलों आरक्षण देकर उसे योग्य, सक्षम बनाना नहीं है। उसे आरक्षण में आरक्षण के नाम पर जाति-जाति में, महिला-महिला में, पिछड़ी-पिछड़ी में, दलित-महादलित में वॉट कर “फूड डालो शासन करो” की नीति वह चाहता है। ऐसी नीति से आरक्षण पाने वाले सम्मान के बदले सदा अपमान ही पाते रहेंगे।
एक तरफ सरकार ने जाति-धर्म लिंग की खाई मिटाने के लिए विद्यालयों में समान पोशाक, एक-साथ भोजन योजना लागू किया है। अंतरजातीय विवाह कानून, दलित को मंदिर पुजारी बनाना जैसी योजनाएं बना रखी है। दूसरी तरफ जातिगणना जाति, धर्म, लिंग के आधार आरक्षण देकर वोटर को बांटकर वोट-बैंक बना रहा हैं। यही राजनीतिक दलों में खोट हैं। उसे योग्यता क्षमतावान नहीं बनाकर आरक्षण के नाम पर बांटकर अपमानित करना हैं।

